टी वी और रिएल्टी शोज ... इनदोनों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। तकरीबन चार सालों से टीवी पर रिएल्टी शोज ने कब्जा कर रखा है। गाना गाने, नाचने, दूसरों को हंसान एक्टिंग करने से लेकर कला के हर क्षेत्र में रिएल्टी शोज आ चुके हैं। आजकल इन शोज में एक नया ट्रेण्ड चला है वह है इनपर छोटे छोटे बच्चों का कब्ज़ा। गीत गाने और नृत्य करने तक तो ठीक था पर अब बच्चे लाफ्टर शोज तक भी पहुंच चुके हैं।
किसी को हंसाना आसान काम नहीं है। चार्ली चैपलिन का पर्याय बनी हुई ये कला अब काफी आगे बढ चुकी है क्योंकि अब इसे एक भाषा मिल चुकी है। एक बात का ध्यान रखें । स्वस्थ और फूहड मनोरंजन के बीच एक लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए। हंसी मज़ाक में द्विअर्थी संवादों का बखूबी इस्तेमाल होता रहा है। पर पहले ये एक ग्रुप तक ही सीमित था और सार्वजनिक रूप से मान्य नहीं था। लेकिन आजकल टी वी पर तीन चार माननीय जजों के सामने खडे होकर ,बाक़ायदा सूट बूट और मेकअप के साथ ऐसे संवाद बोले जाते हैं और सोकॉल्ड माननीय जज अपनी कुर्सी से उछल उछलकर हो हो कर हंसते भी हैं मतलब अभद्रता को एप्रिशिएट करते हैं। हद तो तब होती है जब 7-8 साल के छोटे बच्चे ऐसे संवाद बोलते हैं,ऐसे चुटकुले सुनाते। कभी कभी ऐसा लगता है कि छोटे बच्चों के मुख से बडों की भाषा बुलवाई जा रही है।
इन संवादों के द्विअर्थी मायनों से ये बच्चे कितना वाकिफ हैं... ये तो उनके पैरेन्ट्स ही जानते होंगे पर एक बहुत बडा प्रश्न ये भी उभरता है कि कहीं अपने मनोरंजन के लिए हम बच्चों को झूठी प्रशंसा के नाम पर दिग्भ्रमित तो नहीं कर रहे हैं। पहले जहां थोडी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने पर बच्चे अपने बडों की डांट खाते थे आज वही बडे उनकी ऐसी भाषा पर खुश होते हैं और उन्हें मार्क्स भी देते हैं। हम रिएल्टी शोज की चमक दमक के पीछे अपने भविष्य को दॉंव पर लगाए बैठे हैं। बच्चों से उनकी मासूमियत छीन रहे हैं। वस्तुत: हम बच्चों का एडल्टीकरण कर रहे हैं।
मनोरंजन का बाजारीकरण तो हो हीं चुका है अब बच्चों के हो रहे इस बाजारीकरण पर अंकुश लगाने की जरूरत है। रिएल्टी शोज के जरिए बाल प्रतिभाओं को एक मंच तो मिल रहा है पर ये मंच उनको एक दिशात्मक समृद्धि दे तो इनका औचित्य समझ में आता है।
रचना श्रीवास्तव।
Tuesday, December 29, 2009
Metro Yatra
दिल्ली मेट्रो......
डेल्ही मेट्रो की परिधि अब बढ़ चुकी है । डेल्ही से शुरू हुआ इसका सफ़र अब NCR तक पहुँच चुका है। नॉएडा जाना अब आसान हो गया है ...क्योंकि डेल्ही मेट्रो अब आपको नॉएडा तक बड़े प्यार से ले जाती है । पर बात करें उनलोगों की जो इसके पुराने यात्री हैं ....यानि जिन्हें केवल राजौरी , करोल बाग या फिर राजीव चौक तक जाना होता है...उनके हिस्से का प्यार बंट चुका है । यात्री ज्यादा हो चुके है और ट्रेनों की संख्या लगभग उतनी ही है। पर ट्रैफिक और सहूलियत के हिसाब से मेट्रो ही बेस्ट आप्शन है।मैं मेट्रो की प्रशंसक रही हूँ । आज मैं नवादा से झंडेवालान के लिए निकली...रोज़ निकलती हूँ... करीबन २:३० बजे दोपहर को । ट्रेन आई... ओफ्कोर्स सीट नहीं मिली । जब से नॉएडा सिटी सेण्टर तक metro जाने लगी है अमूमन ऐसा ही होता है। कभी जब सीट मिलने की उम्मीद नहीं होती है तो दरवाजे से लगकर खड़ी हो जाती हूँ पर आज मैं ज़रा थकी हुई थी इसीलिए rows के सामने जा कर खड़ी हो गयी । उत्तम नगर east के पास सीट खाली हुई । वहां खड़े सारे लोगों के बीच बैठने का हक़ मेरा ही था क्योंकि वहां खड़े सारे लोगों में एक मैं ही लड़की थी । जनकपुरी पहुँचने पर मेरे सामने एक बुज़ुर्ग महिला आ कर खड़ी हुईं । शिष्टाचारवश मैंने उन्हें अपनी सीट ऑफर की । उन्होंने बड़े प्यार से मुझे धन्यवाद कहा और बैठ गयीं... सच बताऊँ तो उस वक्त उनके लिए खड़ा होना मुझे तनिक भी बुरा नहीं लगा ...बुरा तो तब लगा जब बूढी आंटी के बगल की सीट खाली हुई और उनकी नज़रें मुझे छोड़ अपनी बेटी से टकराईं ...और उन्होंने इशारे से उसे अपने पास बैठने के लिए बुलाया ...खैर.....उस सीट पर मेरी बगल में खड़ा एक लड़का बैठ गया । आंटी की आँखों से खीझ साफ़ दिख रही थी .उस लड़के को शायद पता नहीं था कि वो महिला सशक्तिकरण के दौर में सफ़र कर रहा है ...सामने खड़ी आंटी ने वो खरी खोटी सुनाई ...सामने लेडीज खड़ी है और तुम बैठ रहे हो ...पता नहीं कब अक्ल आएगी....और पता नहीं क्या क्या.....पर लड़का शरीफ था ..खड़ा हो गया ...यक़ीनन उस वक्त उसे अपने पुरुष होने पर अफ़सोस हुआ होगा ......पता नहीं हमारा समाज लिंग भेद भाव से कब निजात पायेगा ...ये उस शरीफ लड़के की दिल की आवाज़ थी....
ट्रेन के अन्दर लोगों की संख्या बढती ही जा रही थी साथ ही खड़े होने की जगह भी कम होती जा रही थी ...शादीपुर के पास एक सीट खाली हुई ..मैंने सोचा चलो १० मिनट बैठने को मिल जाएगा पर मेरे बैठते ही एक नयी नवेली आंटी ( शादी होते ही लड़की आंटी बन जाती है ) ने कहा सीट दे देंगी प्लीज !!!!! मैं बिलकुल भी उठना नहीं चाहती थी ..पैरों में बहुत दर्द हो रहा था ...पर मैं आंटी नहीं हूँ ...और मैं सीट छोड़ के खड़ी हो गयी ....राजेंद्र प्लेस आते ही मैंने धीरे धीरे दरवाजे की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था पर करोल बाग आते ही एक बहुत बड़ा हुजूम अन्दर आया और फिर पैर बढ़ने को एक इंच की भी जगह नहीं बची जिन्हें नहीं उतरना वो भी दरवाजे से चिपक कर खड़े हैं...मैंने सामने वाले excuse me कहा ...उसने कहा... कहाँ जाऊं ...नहीं जा सकता....मैंने कहा जाना तो पड़ेगा क्योंकि मुझे यहीं उतरना है ....उन्होंने अनसुना कर दिया...दरवाजे पर अपने तीन बच्चों के साथ खड़ी मम्मी ने कहा...बच्चों साइड मत होना अगर बाहर निकले तो फिर अन्दर नहीं आ पाओगे ...कहना न होगा मैं बुरी तेरह से फंस चुकी थी ...पूरा प्रयास कर चुकी थी पर उन भीमकाय लोगों के सामने मुझ कृशकाय की क्या बिसात ...अब कहाँ कोई कृष्ण मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करते हैं.....मैं दो स्टेशन आगे राजीव चौक पर ही उतर पायी और फिर दूसरी ट्रेन से अपने गंतव्य पहुंची ....ये है मेरी आज की या य़ूं कहें आजकल की मेट्रो जर्नी...
रचना श्रीवास्तव ,दिल्ली
डेल्ही मेट्रो की परिधि अब बढ़ चुकी है । डेल्ही से शुरू हुआ इसका सफ़र अब NCR तक पहुँच चुका है। नॉएडा जाना अब आसान हो गया है ...क्योंकि डेल्ही मेट्रो अब आपको नॉएडा तक बड़े प्यार से ले जाती है । पर बात करें उनलोगों की जो इसके पुराने यात्री हैं ....यानि जिन्हें केवल राजौरी , करोल बाग या फिर राजीव चौक तक जाना होता है...उनके हिस्से का प्यार बंट चुका है । यात्री ज्यादा हो चुके है और ट्रेनों की संख्या लगभग उतनी ही है। पर ट्रैफिक और सहूलियत के हिसाब से मेट्रो ही बेस्ट आप्शन है।मैं मेट्रो की प्रशंसक रही हूँ । आज मैं नवादा से झंडेवालान के लिए निकली...रोज़ निकलती हूँ... करीबन २:३० बजे दोपहर को । ट्रेन आई... ओफ्कोर्स सीट नहीं मिली । जब से नॉएडा सिटी सेण्टर तक metro जाने लगी है अमूमन ऐसा ही होता है। कभी जब सीट मिलने की उम्मीद नहीं होती है तो दरवाजे से लगकर खड़ी हो जाती हूँ पर आज मैं ज़रा थकी हुई थी इसीलिए rows के सामने जा कर खड़ी हो गयी । उत्तम नगर east के पास सीट खाली हुई । वहां खड़े सारे लोगों के बीच बैठने का हक़ मेरा ही था क्योंकि वहां खड़े सारे लोगों में एक मैं ही लड़की थी । जनकपुरी पहुँचने पर मेरे सामने एक बुज़ुर्ग महिला आ कर खड़ी हुईं । शिष्टाचारवश मैंने उन्हें अपनी सीट ऑफर की । उन्होंने बड़े प्यार से मुझे धन्यवाद कहा और बैठ गयीं... सच बताऊँ तो उस वक्त उनके लिए खड़ा होना मुझे तनिक भी बुरा नहीं लगा ...बुरा तो तब लगा जब बूढी आंटी के बगल की सीट खाली हुई और उनकी नज़रें मुझे छोड़ अपनी बेटी से टकराईं ...और उन्होंने इशारे से उसे अपने पास बैठने के लिए बुलाया ...खैर.....उस सीट पर मेरी बगल में खड़ा एक लड़का बैठ गया । आंटी की आँखों से खीझ साफ़ दिख रही थी .उस लड़के को शायद पता नहीं था कि वो महिला सशक्तिकरण के दौर में सफ़र कर रहा है ...सामने खड़ी आंटी ने वो खरी खोटी सुनाई ...सामने लेडीज खड़ी है और तुम बैठ रहे हो ...पता नहीं कब अक्ल आएगी....और पता नहीं क्या क्या.....पर लड़का शरीफ था ..खड़ा हो गया ...यक़ीनन उस वक्त उसे अपने पुरुष होने पर अफ़सोस हुआ होगा ......पता नहीं हमारा समाज लिंग भेद भाव से कब निजात पायेगा ...ये उस शरीफ लड़के की दिल की आवाज़ थी....
ट्रेन के अन्दर लोगों की संख्या बढती ही जा रही थी साथ ही खड़े होने की जगह भी कम होती जा रही थी ...शादीपुर के पास एक सीट खाली हुई ..मैंने सोचा चलो १० मिनट बैठने को मिल जाएगा पर मेरे बैठते ही एक नयी नवेली आंटी ( शादी होते ही लड़की आंटी बन जाती है ) ने कहा सीट दे देंगी प्लीज !!!!! मैं बिलकुल भी उठना नहीं चाहती थी ..पैरों में बहुत दर्द हो रहा था ...पर मैं आंटी नहीं हूँ ...और मैं सीट छोड़ के खड़ी हो गयी ....राजेंद्र प्लेस आते ही मैंने धीरे धीरे दरवाजे की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था पर करोल बाग आते ही एक बहुत बड़ा हुजूम अन्दर आया और फिर पैर बढ़ने को एक इंच की भी जगह नहीं बची जिन्हें नहीं उतरना वो भी दरवाजे से चिपक कर खड़े हैं...मैंने सामने वाले excuse me कहा ...उसने कहा... कहाँ जाऊं ...नहीं जा सकता....मैंने कहा जाना तो पड़ेगा क्योंकि मुझे यहीं उतरना है ....उन्होंने अनसुना कर दिया...दरवाजे पर अपने तीन बच्चों के साथ खड़ी मम्मी ने कहा...बच्चों साइड मत होना अगर बाहर निकले तो फिर अन्दर नहीं आ पाओगे ...कहना न होगा मैं बुरी तेरह से फंस चुकी थी ...पूरा प्रयास कर चुकी थी पर उन भीमकाय लोगों के सामने मुझ कृशकाय की क्या बिसात ...अब कहाँ कोई कृष्ण मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करते हैं.....मैं दो स्टेशन आगे राजीव चौक पर ही उतर पायी और फिर दूसरी ट्रेन से अपने गंतव्य पहुंची ....ये है मेरी आज की या य़ूं कहें आजकल की मेट्रो जर्नी...
रचना श्रीवास्तव ,दिल्ली
Telangana
इसमें संदेह है कि तेलंगाना के मसले पर कांग्रेस में कोई मतभेद नहीं है। आंध्रप्रदेश में इसका नेतृत्व और कार्यकर्ता आमतौर पर उप क्षेत्रीय और जातिगत आधार पर बंटे हुए हैं। आप राज्य के बंटवारे के समर्थन में हैं या विरोध में, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप कौन हैं, क्योंकि किसी वर्ग से संबंध या जाति भी आपके नजरिए को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाती है।
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